Blind faith
विश्व में धार्मिक व्यक्तियों की भरमार हैं प्रत्येक धर्म के अनुयाई अपनी साधना को सत्य मानकर पूर्ण श्रद्धा तथा लगन के साथ समर्पित भाव से कर रहे हैं एक दूसरे को देख कर या सुनकर धार्मिक क्रिया करने लग जाते हैं विशेष जांच नहीं करते हैं यही कारण है कि आध्यात्मिक लाभ से वंचित रहते हैं एक पूजा से लाभ नहीं होता है तो किसी के कहने से अन्य पूजा शुरु कर दी यदि हम कोई व्यापार या धंधा करने का विचार करते हैं तो पहले उसकी संपूर्ण जानकारी प्राप्त करते हैं परंतु धार्मिक लाभ लेने के लिए विवेक के स्थान पर एक दूसरे से सुनी धार्मिक क्रियाएं करते हैं या किसी को देखकर उसका अनुसरण करने लगते हैं उन धार्मिक क्रियाओं की सत्यता के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं समझते हैं पवित्र हिंदू धर्म को मानने वाले श्रद्धालु धार्मिकता से ओतप्रोत हैं जो मानव स्त्री पुरुष परमात्मा के प्रति तड़प रखता है यह उसके पूर्व जन्म के भक्ति कर्मों के शक्ति के कारण हैं वह भक्ति किए बिना नहीं रह सकता है वह बचपन में जो घर परिवार व क्षेत्र में किसी देवी देवता या बाबा सिद्ध कि साधना पूजा की परंपरा चल रही होती हैं उसे पूरी लगन से करता है जो गीता जी में मना कर रखे हैं प्रमाण श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 16 श्लोक 23 24 मे कहा है जो साधक शास्त्र विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करता है यानी जो साधना शास्त्रों में वर्णित हैं उसी के विपरीत साधना करना मनमाना आचरण कहा जाता है उस मनमाने आचरण करने वाले को ना तो सुख की प्राप्ति होती है नहीं सिद्धि यानी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती हैं ना उसकी गति होती हैं
कबीर परमेश्वर जी ने कहा है
कबीर पीछे लागा जाऊं था लॉक वेद के साथ रास्ते में सदगुरु मिल गए दीपक दे दिया हाथ
परमात्मा कबीर जी ने सूक्ष्म वेद का ज्ञान अपने मुख कमल से बोली वाणी में बताया है की जब तक सतगुरु वेद शास्त्रों का ज्ञाता गुरु नहीं मिलता तब तक पूर्व जन्मों के शुभ संस्कार से प्रेरित साधक लोक वेद जो सुना सुनाया ज्ञान जो शास्त्र प्रमाणित ना हो यानी दंत कथाओं के आधार से साधना करता है उस शास्त्र विधि विरुद्ध साधना के सफर में जिस समय सदगुरु मिल जाता है तो सदगुरु शास्त्रोक्त ज्ञान यानी तत्व ज्ञान रूपी दीपक देता है जिसके प्रकाश में साधक अंधश्रद्धा भक्ति जो अज्ञान अंधेरे में कर रहा था दिशाहीन भटक रहा था को त्याग कर सीधे भक्ति मार्ग पर चल पड़ता है जो लाभदायक हैं
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